लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने देश के 25 करोड़ लोगों को साधने का मास्टर स्ट्रोक चला है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सत्ता में आने पर देश के 20 फीसदी गरीबों को हर साल 72 हजार रुपये सालाना देने के लिए 'न्यूनतम आय योजना' (NYAY) शुरू करने का वादा किया. कांग्रेस ने इस योजना का नाम 'न्याय' रखा है. अब देखना है कि राहुल गांधी के इस योजना के जरिए देश के लोगों का दिल जीत पाते हैं या नहीं.
कांग्रेस किसान के कर्जमाफी एलान के जरिए मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव जीतने में सफल रही थी. यही वजह है कि राहुल गांधी लोकसभा चुनाव 2019 को फतह करने के लिए 'NYAY' का ऐलान किया है.
एयर स्ट्राइक के बाद कांग्रेस बैकफुट पर नजर आ रही थी और बीजेपी के हौसले बुलंद थे. ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने न्यूनतम आय स्कीम (NYAY) के रूप में बड़ा दांव चला है. माना जा रहा है कि कांग्रेस इस योजना के जरिए सीधे तौर पर देश के 25 करोड़ लोगों को साधने की कोशिश की है, जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने न्यूनतम गारंटी योजना का वादा किया, जिसके तहत कांग्रेस अगर सत्ता में आती है तो हर किसी को 12 हजार रुपये प्रति महीने कांग्रेस सरकार देगी. राहुल गांधी ने कहा कि पांच साल तक मोदी सरकार में गरीब दुखी रहे हैं. ऐसे में अब हम उन्हें न्याय देंगे. राहुल ने कहा कि हमने मनरेगा कमिट किया था और अब आय गारंटी देकर दिखा देंगे.
राहुल ने कहा कि हम गरीबी मिटा देंगे. हमारा कहना है कि अगर आप काम कर रहे हो तो महीने में 12 हजार रुपए से आय कम से कम होनी चाहिए. हिंदुस्तान में अगर मिनिमम इनकम से कम आमदनी है तो यह आय बढ़ाने की कोशिश होगी. जिससे गरीबी से निकाला जा सकता है. यह सेकेंड फेज में 25 करोड़ लोगों को गरीबी से निकाल देगी. इस योजना को हम आगे लाकर दिखाएंगे.
नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेते हुए राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री की पॉलिटिक्स से दो हिंदुस्तानी झंडा है. एक अनिल अंबानी झंडा और दूसरा गरीबी के लिए. 21वीं सदी में हिंदुस्तान में इस देश में गरीबी को हटाना है. यह स्कीम नहीं है, यह अब गरीबी पर आखिरी पड़ाव है. उन्होंने कहा कि हम दो हिंदुस्तान नहीं बनने देंगे, यह अमीरों और गरीबों दोनों का ही देश होगा. ऐसे में गरीबों को भी इज्जत दिलाना चाहता हूं.
कांग्रेस की कवायद इस योजना के सहारे आगामी चुनावों में गरीब तबके के वोट के लुभाने की है. ऐसे में सवाल है कि 'न्यूनतम आय योजना' (NYAY) के लागू करने के बाद देश से गरीबी का नामोनिशान क्या मिट जाएगा? राहुल गांधी की दादी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1971 में गरीब हटाओ का नारा दिया था. इसका चुनाव में कांग्रेस को फायदा भी मिला था. ऐसे में कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में 2019 में सियासी लाभ मिलेगा, ये देखना होगा.
दरअसल आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 द्वारा दिए गए मॉडल के मुताबिक देश में गरीबी रेखा का आंकलन उचित ढंग से नहीं किया गया है. जहां तेंदुलकर फॉर्मूले से 22 फीसदी जनसंख्या को गरीब बताया गया, वहीं इसके बाद हुए सी रंगराजन फॉर्मूले ने 29.5 फीसदी यानि 36.3 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा के नीचे बताया. वहीं प्रति व्यक्ति खर्च के स्तर को भी 2012 में 27.2 रुपये से सुधार कर 2014-15 में 32 रुपये कर दिया गया. जबकि शहरी इलाकों के लिए इस खर्च को 33.3 रुपये से बढ़ाकर 47 रुपये प्रति व्यक्ति कर दिया गया.
Monday, March 25, 2019
Monday, March 18, 2019
नेपाल न चौकीदारों का सप्लायर है, न भारत का ताबेदार: ब्लॉग
आम आदमी पार्टी की विधायक अलका लांबा के इस ट्वीट में आए 'मंगवा सकते हैं' पर थोड़ा ग़ौर कीजिए. ध्वनि निकलेगी -- हम मालिक हैं, हमारे पास अथाह पैसा और ताक़त है और हम कहीं से कुछ भी मँगा सकते हैं. और नेपाल से चौकीदारों के अलावा और मँगा भी क्या सकते हैं.
उबले अंडों की दुकान पर शाम को बोतल के इंतज़ार में बैठे बेवड़े भी ऐसे ही बात करते हैं - "अरे, दारू तो हम जितनी चाहे मँगा लेंगे. हमें किस बात की कमी है!"
अलका लांबा को पता भी नहीं चला कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने नेपाल के लोगों के बारे में जो कह दिया उससे विवाद खड़ा हो सकता है. उन्होंने वर्तनी की अशुद्धि के साथ ट्वीट किया - "प्रिय भारतवासियों, कृप्या इस बार प्रधानमंत्री चुनियेगा, चौकीदार तो हम नेपाल से भी मंगवा सकते हैं. नेपाल के चौकीदार चोर नहीं होते."
लांबा को लगता है कि हम, यानी भारत, चौकीदारों की सप्लाई का ऑर्डर करेंगे, नेपाल चौखट पर खड़े दरबान की तरह सिर झुकाएगा और अगले ही दिन हमारे यहाँ नेपाली चौकीदारों की लाइन लग जाएगी? वो भूल गईं कि नेपाल एक स्वतंत्र राष्ट्र है - भारत की तरह कभी ग़ुलाम नहीं रहा -- और वो भारत और चीन के बीच एक आज़ाद मुल्क है और अलका लांबा के लिए चौकीदारों की सप्लाई नहीं करता.
अलका लांबा पढ़ी लिखी हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ की अध्यक्ष रही हैं. सुलझी हुई लगती हैं. पर उन्हें ये समझ लेना चाहिए कि नेपाल में सिर्फ़ चौकीदार ही नहीं होते. वहाँ आइटी प्रोफ़ेशनल, अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक, एक्टर, ब्यूटी क्वींस, संगीतकार आदि भी होते हैं. वहाँ चौकीदार, सफ़ाई कर्मचारी, मज़दूर, किसान और दूसरे मेहनतकश भी होते हैं जैसा कि दिल्ली, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक या केरल में होते हैं.
अलका लांबा को ये भी जानना चाहिए कि नेपाल के लोग ठीक वैसे ही रोज़गार के लिए दूसरे देशों में जाते हैं जैसे हिंदुस्तान में पंजाब, गुजरात, राजस्थान या केरल आदि राज्यों से लोग टैक्सी चलाने, सफ़ाई करने या कारख़ानों में काम करने के लिए, गल्फ़, कनाडा, अमरीका, ब्रिटेन, इटली या फ़्रांस जाते हैं. लांबा का बयान ऐसा ही है जैसे डॉनल्ड ट्रंप कहें -चलो जल्दी से कुछ इंडियंस को मँगाओ, न्यूयॉर्क शहर में बहुत गंदगी हो गई है.
पर नेपाल को अपनी जागीर समझने वाली अलका लांबा अकेली नहीं हैं. उन्होंने अपनी ग़लती का एहसास करके ये ट्वीट ज़रूर मिटा दिया है पर इससे वो मानसिकता नहीं मिट सकती जो नेपाल को भारत का ताबेदार समझती है. नेपाल के लोगों को इस बात का अच्छी तरह एहसास है कि उत्तर भारत में नेपाल को अपनी जायदाद समझने वाले काफ़ी लोग हैं.
पिछले महीने काठमांडू से दिल्ली आ रही एअर इंडिया की फ़्लाइट में मेरे साथ बैठे एक भारतीय मुसाफ़िर ने जब बीयर माँगी तो फ़्लाइट अटेंडेंट ने एक चौड़ी सी प्लास्टिक मुस्कान के साथ जवाब दिया, "सर, ये डॉमेस्टिक फ़्लाइट है इसमें हम बीयर सर्व नहीं करते."
मैं उस अटेंडेंट से पूछना चाहता था कि नेपाल जाने वाली फ़्लाइट कब से डॉमेस्टिक या घरेलू उड़ान हो गई? कब से नेपाल को आपने भारत में शामिल कर लिया, डूड?
नेपाल एक स्वतंत्र देश है जहाँ का अलग संविधान, अलग प्रधानमंत्री, अलग संसद और अलग सेना है. पर एक स्वतंत्र देश से दूसरे स्वतंत्र देश के बीच आ रही फ़्लाइट को जैसे वो फ़्लाइट अटेंडेंट घरेलू उड़ान मानकर चल रहा था उसी तरह आम आदमी की पार्टी की विधायक अलका लांबा को भी लगता है कि "चौकीदार तो हम नेपाल से मँगा लेंगे."
नेपाल के त्रिभुवन हवाई अड्डे में तैनात वो नेपाली इमिग्रेशन अफ़सर शायद ऐसे कई भारतीयों से मिलता रहा होगा जिसने मुझ पर कटाक्ष किया -- "तपाईँ को मुलुक ठुलो, र तपाईँ को जुंगापनि ठुलो" यानी तुम्हारा देश भी बहुत बड़ा है और तुम्हारी मूछें यानी अहम (अहंकार) भी बहुत बड़ा है. फ़्लाइट में कई घंटे की देरी होने पर मैं उस अफ़सर से शिकायत करना चाह रहा था पर वो अधिकारी भरा बैठा था.
नेपालियों को वाक़ई लगता है कि भारत बड़ा मुल्क है इसलिए भारतीयों का अहम भी बहुत बड़ा है. कई बार भारतीयों को ये एहसास ही नहीं होता कि नेपाल के बारे में जो कुछ कह या सोच रहे हैं वो नेपाल के लोगों को पसंद नहीं आता. उनका मासूम सवाल होता है कि हम तो नेपाल को अपना मानते हैं फिर क्या समस्या है?
काठमांडू पहुँचने के तुरंत बाद मैंने भी ऐसी ही उत्तर भारतीय नादानी में नेपाली साथियों से कहा - नेपाल बिल्कुल घर जैसा लगता है. बिना एक पल गँवाए बातचीत में शामिल एक नेपाली साथी ने तुरंत कहा - "हाँ, आपके प्रधानमंत्री मोदी जी भी ऐसा ही कहते हैं."
मुझे तुरंत समझ में आ गया कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी की पहली यात्रा के दौरान जो नेपाली नागरिक मोदी-मोदी के नारे लगाते हुए सड़कों पर उनके स्वागत के लिए उमड़ पड़े थे वो आज क्यों मोदी का ज़िक्र आते ही सवालों की झड़ी क्यों लगा देते हैं.
इस तरह के वाक्यों से नेपाल के लोगों को लगता है कि भारतीय लोग नेपाल के स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते, बल्कि उसे अपनी छत्रछाया में रखना चाहते हैं. धुर आज़ाद ख़याल नेपालियों को भारतीयों की ऐसी मोहब्बत क़तई पसंद नहीं आती. बल्कि इसमें उन्हें 'सांस्कृतिक विस्तारवाद' की बू आती है.
तीन महीने तक काठमांडू में रहकर काम करने और नेपाल के कई शहरों और गाँवों में घूमने के बाद मुझे एक बार नहीं कई बार ऐसे सवालों का सामना करना पड़ा. बसों में, दुकानों में, होटलों में, सड़क पर बातचीत करते लोगों ने मुझसे बार बार एक ही सवाल किया - मोदी जी ने हमें ख़ून के आँसू रुला दिए, मगर क्यों?
नेपाल के लोग, ख़ास तौर पर पहाड़ी इलाक़ों में रहने वाले लोग 2015 के उन दिनों को भूले नहीं हैं जब नरेंद्र मोदी सरकार ने नेपाल की 'अघोषित आर्थिक नाकेबंदी' कर दी थी और लोग पेट्रोल, डीज़ल, गैस जैसी चीज़ों के मोहताज हो गए थे.
कई लोग अपनी कारों और मोटरसाइकिलों को ताला लगाकर साइकिल ख़रीदने पर मजबूर हो गए थे. पर नेपाल की नाकेबंदी कोई पहली बार नहीं हुई थी राजीव गाँधी जब प्रधानमंत्री थे तब भी भारत ने नेपाल का घेराव किया था.
उबले अंडों की दुकान पर शाम को बोतल के इंतज़ार में बैठे बेवड़े भी ऐसे ही बात करते हैं - "अरे, दारू तो हम जितनी चाहे मँगा लेंगे. हमें किस बात की कमी है!"
अलका लांबा को पता भी नहीं चला कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने नेपाल के लोगों के बारे में जो कह दिया उससे विवाद खड़ा हो सकता है. उन्होंने वर्तनी की अशुद्धि के साथ ट्वीट किया - "प्रिय भारतवासियों, कृप्या इस बार प्रधानमंत्री चुनियेगा, चौकीदार तो हम नेपाल से भी मंगवा सकते हैं. नेपाल के चौकीदार चोर नहीं होते."
लांबा को लगता है कि हम, यानी भारत, चौकीदारों की सप्लाई का ऑर्डर करेंगे, नेपाल चौखट पर खड़े दरबान की तरह सिर झुकाएगा और अगले ही दिन हमारे यहाँ नेपाली चौकीदारों की लाइन लग जाएगी? वो भूल गईं कि नेपाल एक स्वतंत्र राष्ट्र है - भारत की तरह कभी ग़ुलाम नहीं रहा -- और वो भारत और चीन के बीच एक आज़ाद मुल्क है और अलका लांबा के लिए चौकीदारों की सप्लाई नहीं करता.
अलका लांबा पढ़ी लिखी हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ की अध्यक्ष रही हैं. सुलझी हुई लगती हैं. पर उन्हें ये समझ लेना चाहिए कि नेपाल में सिर्फ़ चौकीदार ही नहीं होते. वहाँ आइटी प्रोफ़ेशनल, अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक, एक्टर, ब्यूटी क्वींस, संगीतकार आदि भी होते हैं. वहाँ चौकीदार, सफ़ाई कर्मचारी, मज़दूर, किसान और दूसरे मेहनतकश भी होते हैं जैसा कि दिल्ली, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक या केरल में होते हैं.
अलका लांबा को ये भी जानना चाहिए कि नेपाल के लोग ठीक वैसे ही रोज़गार के लिए दूसरे देशों में जाते हैं जैसे हिंदुस्तान में पंजाब, गुजरात, राजस्थान या केरल आदि राज्यों से लोग टैक्सी चलाने, सफ़ाई करने या कारख़ानों में काम करने के लिए, गल्फ़, कनाडा, अमरीका, ब्रिटेन, इटली या फ़्रांस जाते हैं. लांबा का बयान ऐसा ही है जैसे डॉनल्ड ट्रंप कहें -चलो जल्दी से कुछ इंडियंस को मँगाओ, न्यूयॉर्क शहर में बहुत गंदगी हो गई है.
पर नेपाल को अपनी जागीर समझने वाली अलका लांबा अकेली नहीं हैं. उन्होंने अपनी ग़लती का एहसास करके ये ट्वीट ज़रूर मिटा दिया है पर इससे वो मानसिकता नहीं मिट सकती जो नेपाल को भारत का ताबेदार समझती है. नेपाल के लोगों को इस बात का अच्छी तरह एहसास है कि उत्तर भारत में नेपाल को अपनी जायदाद समझने वाले काफ़ी लोग हैं.
पिछले महीने काठमांडू से दिल्ली आ रही एअर इंडिया की फ़्लाइट में मेरे साथ बैठे एक भारतीय मुसाफ़िर ने जब बीयर माँगी तो फ़्लाइट अटेंडेंट ने एक चौड़ी सी प्लास्टिक मुस्कान के साथ जवाब दिया, "सर, ये डॉमेस्टिक फ़्लाइट है इसमें हम बीयर सर्व नहीं करते."
मैं उस अटेंडेंट से पूछना चाहता था कि नेपाल जाने वाली फ़्लाइट कब से डॉमेस्टिक या घरेलू उड़ान हो गई? कब से नेपाल को आपने भारत में शामिल कर लिया, डूड?
नेपाल एक स्वतंत्र देश है जहाँ का अलग संविधान, अलग प्रधानमंत्री, अलग संसद और अलग सेना है. पर एक स्वतंत्र देश से दूसरे स्वतंत्र देश के बीच आ रही फ़्लाइट को जैसे वो फ़्लाइट अटेंडेंट घरेलू उड़ान मानकर चल रहा था उसी तरह आम आदमी की पार्टी की विधायक अलका लांबा को भी लगता है कि "चौकीदार तो हम नेपाल से मँगा लेंगे."
नेपाल के त्रिभुवन हवाई अड्डे में तैनात वो नेपाली इमिग्रेशन अफ़सर शायद ऐसे कई भारतीयों से मिलता रहा होगा जिसने मुझ पर कटाक्ष किया -- "तपाईँ को मुलुक ठुलो, र तपाईँ को जुंगापनि ठुलो" यानी तुम्हारा देश भी बहुत बड़ा है और तुम्हारी मूछें यानी अहम (अहंकार) भी बहुत बड़ा है. फ़्लाइट में कई घंटे की देरी होने पर मैं उस अफ़सर से शिकायत करना चाह रहा था पर वो अधिकारी भरा बैठा था.
नेपालियों को वाक़ई लगता है कि भारत बड़ा मुल्क है इसलिए भारतीयों का अहम भी बहुत बड़ा है. कई बार भारतीयों को ये एहसास ही नहीं होता कि नेपाल के बारे में जो कुछ कह या सोच रहे हैं वो नेपाल के लोगों को पसंद नहीं आता. उनका मासूम सवाल होता है कि हम तो नेपाल को अपना मानते हैं फिर क्या समस्या है?
काठमांडू पहुँचने के तुरंत बाद मैंने भी ऐसी ही उत्तर भारतीय नादानी में नेपाली साथियों से कहा - नेपाल बिल्कुल घर जैसा लगता है. बिना एक पल गँवाए बातचीत में शामिल एक नेपाली साथी ने तुरंत कहा - "हाँ, आपके प्रधानमंत्री मोदी जी भी ऐसा ही कहते हैं."
मुझे तुरंत समझ में आ गया कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी की पहली यात्रा के दौरान जो नेपाली नागरिक मोदी-मोदी के नारे लगाते हुए सड़कों पर उनके स्वागत के लिए उमड़ पड़े थे वो आज क्यों मोदी का ज़िक्र आते ही सवालों की झड़ी क्यों लगा देते हैं.
इस तरह के वाक्यों से नेपाल के लोगों को लगता है कि भारतीय लोग नेपाल के स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते, बल्कि उसे अपनी छत्रछाया में रखना चाहते हैं. धुर आज़ाद ख़याल नेपालियों को भारतीयों की ऐसी मोहब्बत क़तई पसंद नहीं आती. बल्कि इसमें उन्हें 'सांस्कृतिक विस्तारवाद' की बू आती है.
तीन महीने तक काठमांडू में रहकर काम करने और नेपाल के कई शहरों और गाँवों में घूमने के बाद मुझे एक बार नहीं कई बार ऐसे सवालों का सामना करना पड़ा. बसों में, दुकानों में, होटलों में, सड़क पर बातचीत करते लोगों ने मुझसे बार बार एक ही सवाल किया - मोदी जी ने हमें ख़ून के आँसू रुला दिए, मगर क्यों?
नेपाल के लोग, ख़ास तौर पर पहाड़ी इलाक़ों में रहने वाले लोग 2015 के उन दिनों को भूले नहीं हैं जब नरेंद्र मोदी सरकार ने नेपाल की 'अघोषित आर्थिक नाकेबंदी' कर दी थी और लोग पेट्रोल, डीज़ल, गैस जैसी चीज़ों के मोहताज हो गए थे.
कई लोग अपनी कारों और मोटरसाइकिलों को ताला लगाकर साइकिल ख़रीदने पर मजबूर हो गए थे. पर नेपाल की नाकेबंदी कोई पहली बार नहीं हुई थी राजीव गाँधी जब प्रधानमंत्री थे तब भी भारत ने नेपाल का घेराव किया था.
Friday, March 15, 2019
अमित शाह ख़ुश हुए पर शीला दीक्षित बोलीं ऐसा नहीं कहा
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के एक बयान को पीएम मोदी के समर्थन में दिया बताया जा रहा है.
शीला दीक्षित ने न्यूज़ 18 को एक इंटरव्यू दिया है. इसी इंटरव्यू में एक सवाल पर दिया गया उनका जवाब काफ़ी सुर्खियां बटोर रहा है.
इंटरव्यू शीला दीक्षित कहा है, ''पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सीमा पार चरमपंथ से निपटने में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह शायद मज़बूत नहीं थे. लेकिन यह भी मानना है कि ये सब राजनीति साधने के लिए किया जा रहा है.''
इंटरव्यू में जब शीला दीक्षित से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि भारत हमेशा सुरक्षित रहा है.
लेकिन जब यह पूछा गया कि कुछ लोग यह कह कर यूपीए सरकार की आलोचना कर रहे हैं कि 2008 में हुए मुंबई हमले का उचित जवाब नहीं दिया गया.
सबसे पहली प्रतिक्रिया दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया की आई.
सिसोदिया के ट्वीट को रीट्वीट करते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लिखा कि कांग्रेस और बीजेपी में कुछ तो खिचड़ी पक रही है.
हालांकि, शीला दीक्षित की मोदी पर इस प्रतिक्रिया के बाद जब राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आईं तो उन्होंने (शीला दीक्षित ने) न्यूज़ एजेंसी एएनआई से कहा कि, "अप्रासंगिक चीज़ें कही जा रही हैं."
शीला दीक्षित ने ट्वीट करके भी अपनी सफ़ाई दी.
उन्होंने लिखा, "मीडिया मेरे इंटरव्यू को तोड़ मरोड़ कर पेश कर रहा है. मैंने कहा था कि कुछ लोगों को लग सकता है कि मोदी आतंक पर मज़बूत हैं, लेकिन मुझे लगता है कि यह एक चुनावी नौटंकी है."
दूसरे ट्वीट में उन्होंने लिखा, "मैंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा हमेशा एक चिंता का विषय रही है और इंदिरा जी इसे लेकर एक मज़बूत नेता रही हैं."
इसके बाद इंटरव्यू लेने वाले पत्रकार वीर सांघवी ने भी ट्वीट कर लिखा कि जो कुछ शीला दीक्षित ने ट्वीट किया वो बिल्कुल सही है और इसे अलग मुद्दे से जोड़ कर न देखें.
सांघवी ने फिर इंटरव्यू के उस हिस्से की ट्रांसक्रिप्ट को ट्वीट किया. जिसमें यह स्पष्ट हुआ कि पूरा मामला क्या है.
जब सांघवी ने जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों पर किए गए एयर स्ट्राइक पर सवाल पूछा तो शीला दीक्षित ने कहा कि यह तो कोई भी करता.
फिर संघवी ने पूछा कि मनमोहन सिंह ने तो नहीं किया मुंबई पर हुए हमलों के बाद?
इस पर शीला दीक्षित ने कहा, "मनमोहन सिंह... हां मैं आपकी बात मानती हूं कि वो शायद मोदी जैसे मजबूत और दृढ़ नहीं थे लेकिन यह भी धारणा है कि उन्होंने यह सब राजनीति के लिए किया है. न कि वो ऐसा ही करना चाहते थे."
हालांकि शीला दीक्षित के ट्वीट कर सफ़ाई देने के बावजूद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने उनके बयान के लिए धन्यवाद दिया और ट्वीट किया. उन्होंने लिखा कि देश को पहले से पता है लेकिन कांग्रेस पार्टी इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है.
अमित शाह का ट्वीट जब आया तो एक बार फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लिखा कि बीजेपी-कांग्रेस का गठबंधन सामने आ गया.
दरअसल, पिछले कई महीनों से अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के साथ गठबंधन करने की चाहत खुलेआम जताते रहे लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने यह घोषणा कर दी कि वो दिल्ली की सभी सात सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगे.
इसके बाद अरविंद केजरीवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि आम आदमी पार्टी बिना कांग्रेस के सभी सात सीटों पर जीतेगी.
हालांकि इस दौरान दोनों पार्टी एक दूसरे पर प्रत्यक्ष हमला करने से बचते रहे हैं. गौरतलब है कि दिल्ली में 12 मई को लोकसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे.
शीला दीक्षित ने न्यूज़ 18 को एक इंटरव्यू दिया है. इसी इंटरव्यू में एक सवाल पर दिया गया उनका जवाब काफ़ी सुर्खियां बटोर रहा है.
इंटरव्यू शीला दीक्षित कहा है, ''पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सीमा पार चरमपंथ से निपटने में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह शायद मज़बूत नहीं थे. लेकिन यह भी मानना है कि ये सब राजनीति साधने के लिए किया जा रहा है.''
इंटरव्यू में जब शीला दीक्षित से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि भारत हमेशा सुरक्षित रहा है.
लेकिन जब यह पूछा गया कि कुछ लोग यह कह कर यूपीए सरकार की आलोचना कर रहे हैं कि 2008 में हुए मुंबई हमले का उचित जवाब नहीं दिया गया.
सबसे पहली प्रतिक्रिया दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया की आई.
सिसोदिया के ट्वीट को रीट्वीट करते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लिखा कि कांग्रेस और बीजेपी में कुछ तो खिचड़ी पक रही है.
हालांकि, शीला दीक्षित की मोदी पर इस प्रतिक्रिया के बाद जब राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आईं तो उन्होंने (शीला दीक्षित ने) न्यूज़ एजेंसी एएनआई से कहा कि, "अप्रासंगिक चीज़ें कही जा रही हैं."
शीला दीक्षित ने ट्वीट करके भी अपनी सफ़ाई दी.
उन्होंने लिखा, "मीडिया मेरे इंटरव्यू को तोड़ मरोड़ कर पेश कर रहा है. मैंने कहा था कि कुछ लोगों को लग सकता है कि मोदी आतंक पर मज़बूत हैं, लेकिन मुझे लगता है कि यह एक चुनावी नौटंकी है."
दूसरे ट्वीट में उन्होंने लिखा, "मैंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा हमेशा एक चिंता का विषय रही है और इंदिरा जी इसे लेकर एक मज़बूत नेता रही हैं."
इसके बाद इंटरव्यू लेने वाले पत्रकार वीर सांघवी ने भी ट्वीट कर लिखा कि जो कुछ शीला दीक्षित ने ट्वीट किया वो बिल्कुल सही है और इसे अलग मुद्दे से जोड़ कर न देखें.
सांघवी ने फिर इंटरव्यू के उस हिस्से की ट्रांसक्रिप्ट को ट्वीट किया. जिसमें यह स्पष्ट हुआ कि पूरा मामला क्या है.
जब सांघवी ने जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों पर किए गए एयर स्ट्राइक पर सवाल पूछा तो शीला दीक्षित ने कहा कि यह तो कोई भी करता.
फिर संघवी ने पूछा कि मनमोहन सिंह ने तो नहीं किया मुंबई पर हुए हमलों के बाद?
इस पर शीला दीक्षित ने कहा, "मनमोहन सिंह... हां मैं आपकी बात मानती हूं कि वो शायद मोदी जैसे मजबूत और दृढ़ नहीं थे लेकिन यह भी धारणा है कि उन्होंने यह सब राजनीति के लिए किया है. न कि वो ऐसा ही करना चाहते थे."
हालांकि शीला दीक्षित के ट्वीट कर सफ़ाई देने के बावजूद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने उनके बयान के लिए धन्यवाद दिया और ट्वीट किया. उन्होंने लिखा कि देश को पहले से पता है लेकिन कांग्रेस पार्टी इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है.
अमित शाह का ट्वीट जब आया तो एक बार फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लिखा कि बीजेपी-कांग्रेस का गठबंधन सामने आ गया.
दरअसल, पिछले कई महीनों से अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के साथ गठबंधन करने की चाहत खुलेआम जताते रहे लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने यह घोषणा कर दी कि वो दिल्ली की सभी सात सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगे.
इसके बाद अरविंद केजरीवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि आम आदमी पार्टी बिना कांग्रेस के सभी सात सीटों पर जीतेगी.
हालांकि इस दौरान दोनों पार्टी एक दूसरे पर प्रत्यक्ष हमला करने से बचते रहे हैं. गौरतलब है कि दिल्ली में 12 मई को लोकसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे.
Monday, March 11, 2019
इथियोपियन एयरलाइंस हादसा: इथियोपिया, चीन ने बोइंग 737 मैक्स-8 की उड़ानें बंद की
इथियोपियन एयरलाइंस का बोइंग 737 मैक्स 8 रविवार को हादसे का शिकार हो गया और इसमें सवार सभी 157 लोगों की मौत हो गई.
पिछले पाँच महीने में बोइंग के इस नए विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने की ये दूसरी घटना थी. पिछले साल अक्टूबर में लायन एयरलाइंस का बोइंग मैक्स विमान भी जकार्ता से उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद हादसे का शिकार हो गया था और 189 लोगों की जान चली गई थी.
लायन एयरलाइंस ने इस विमान को हादसे से तीन महीने पहले ही अपने बेड़े में शामिल किया था.
बोइंग 737 मैक्स-8 का कॉमर्शियल इस्तेमाल 2017 में ही शुरू हुआ था और सुरक्षा को लेकर कंपनी ने बड़े-बड़े दावे भी किए थे.
हालाँकि विशेषज्ञों का कहना है कि अभी ये कहना जल्दबाज़ी होगा कि इथियोपियन एयरलाइंस का विमान किन वजहों से दुर्घटनाग्रस्त हुआ.
लेकिन इथियोपियन एयरलाइंस के भी उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद क्रैश होने से इस जम्बोजेट की सुरक्षा को लेकर आशंकाएं जताई जाने लगी हैं.
इथियोपिया ने अपने सभी बोइंग विमानों को फ़िलहाल नहीं उड़ाने का फ़ैसला किया है.
चीन ने भी अपनी घरेलू उड़ानों में इस्तेमाल होने वाले इस मॉडल के सभी विमानों की उड़ने से रोक दिया है.
चीन के नागरिक विमानन प्रशासन ने एक बयान जारी कर कहा, "दो विमान हादसों में बोइंग 737 मैक्स 8 ही शामिल था और उड़ान भरने के कुछ देर बाद ही ये हादसे का शिकार हो गया था. इनमें कुछ समानता भी नज़र आ रही है."
जकार्ता स्थित एविएशन एक्सपर्ट गैरी सोयजेटमैन ने बीबीसी को बताया कि पिछले मॉडल की तुलना में 737 मैक्स का इंजन थोड़ा आगे है और विंग्स के मुक़ाबले इसकी ऊंचाई कुछ अधिक है. इससे विमान का संतुलन प्रभावित होता है.
चीन में बोइंग 737 मैक्स 8 के 90 से अधिक विमान घरेलू उड़ानों में इस्तेमाल हो रहे हैं.
बोइंग एयरप्लेन्स ने भी हादसे पर दुख जताया है और कहा है कि उनकी टीम वहाँ पहुँच रही है, जहाँ इथियोपियन एयरलाइंस का विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ और वो जाँचकर्ताओं को तकनीकी सहायता मुहैया कराएगी.
पिछले पाँच महीने में बोइंग के इस नए विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने की ये दूसरी घटना थी. पिछले साल अक्टूबर में लायन एयरलाइंस का बोइंग मैक्स विमान भी जकार्ता से उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद हादसे का शिकार हो गया था और 189 लोगों की जान चली गई थी.
लायन एयरलाइंस ने इस विमान को हादसे से तीन महीने पहले ही अपने बेड़े में शामिल किया था.
बोइंग 737 मैक्स-8 का कॉमर्शियल इस्तेमाल 2017 में ही शुरू हुआ था और सुरक्षा को लेकर कंपनी ने बड़े-बड़े दावे भी किए थे.
हालाँकि विशेषज्ञों का कहना है कि अभी ये कहना जल्दबाज़ी होगा कि इथियोपियन एयरलाइंस का विमान किन वजहों से दुर्घटनाग्रस्त हुआ.
लेकिन इथियोपियन एयरलाइंस के भी उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद क्रैश होने से इस जम्बोजेट की सुरक्षा को लेकर आशंकाएं जताई जाने लगी हैं.
इथियोपिया ने अपने सभी बोइंग विमानों को फ़िलहाल नहीं उड़ाने का फ़ैसला किया है.
चीन ने भी अपनी घरेलू उड़ानों में इस्तेमाल होने वाले इस मॉडल के सभी विमानों की उड़ने से रोक दिया है.
चीन के नागरिक विमानन प्रशासन ने एक बयान जारी कर कहा, "दो विमान हादसों में बोइंग 737 मैक्स 8 ही शामिल था और उड़ान भरने के कुछ देर बाद ही ये हादसे का शिकार हो गया था. इनमें कुछ समानता भी नज़र आ रही है."
जकार्ता स्थित एविएशन एक्सपर्ट गैरी सोयजेटमैन ने बीबीसी को बताया कि पिछले मॉडल की तुलना में 737 मैक्स का इंजन थोड़ा आगे है और विंग्स के मुक़ाबले इसकी ऊंचाई कुछ अधिक है. इससे विमान का संतुलन प्रभावित होता है.
चीन में बोइंग 737 मैक्स 8 के 90 से अधिक विमान घरेलू उड़ानों में इस्तेमाल हो रहे हैं.
बोइंग एयरप्लेन्स ने भी हादसे पर दुख जताया है और कहा है कि उनकी टीम वहाँ पहुँच रही है, जहाँ इथियोपियन एयरलाइंस का विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ और वो जाँचकर्ताओं को तकनीकी सहायता मुहैया कराएगी.
Tuesday, March 5, 2019
फ़र्ज़ी रिकॉर्डिंग से BJP पर 'पुलवामा हमले का आरोप' लगाने की कोशिश: फ़ैक्ट चेक
अमरीका में रहने वाले भारतीय मूल के व्यापारी अवि डांडिया का एक वीडियो सोशल मीडिया पर इस दावे के साथ वायरल हो गया है कि 2019 का लोकसभा चुनाव जीतने के लिए बीजेपी ने ही पुलवामा में सीआरपीएफ़ के काफ़िले पर हमला करवाया और ये पार्टी की एक चाल थी.
वायरल वीडियो में अवि डांडिया अपने दावे को मज़बूती देने के लिए एक कथित कॉल रिकॉर्डिंग सुनवाते हैं जिसमें भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह और भारत के गृह मंत्री राजनाथ सिंह को इस बारे में एक अनजान महिला के साथ बात करते हुए सुना जा सकता है.
इस भ्रामक कॉल रिकॉर्डिंग को सुनकर ऐसा लगता है कि पुलवामा हमले की साज़िश बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने ही रची थी. लेकिन अपनी पड़ताल में हमने पाया है कि ये कॉल रिकॉर्डिंग फ़ेक यानी फर्जी है.
1 मार्च को अवि डांडिया ने अपने फ़ेसबुक पेज के ज़रिए लाइव आकर ये ऑडियो लोगों को सुनवाया था.
उन्होंने लिखा था, "सच क्या है, सुनिए अगर विश्वास ना हो और देश की आवाम में दम हो तो पूछे उनसे जिनकी आवाज़ है, जो सेना के नहीं वो आवाम के क्या होंगे."
अवि डांडिया के फ़ेसबुक पेज पर अब ये लाइव वीडियो उपलब्ध नहीं है, लेकिन इंटरनेट आर्काइव से पता चलता है कि वीडियो हटाए जाने से पहले 23 लाख से ज़्यादा बार ये वीडियो देखा गया है और एक लाख से ज़्यादा लोगों ने इसे फ़ेसबुक पर शेयर भी किया है.
'डेली कैपिटल' और 'सियासत डॉट पीके' जैसी छोटी पाकिस्तानी वेबसाइट्स ने भी अवि डांडिया के वीडियो को आधार बनाकर बीजेपी के ख़िलाफ़ ख़बरें लिखी हैं.
सैकड़ों लोग इस वीडियो को फ़ेसबुक से डाउनलोड कर चुके हैं और इसे व्हॉट्सऐप पर शेयर कर रहे हैं. बीबीसी के कई पाठकों ने भी व्हॉट्सऐप के ज़रिए हमें ये वीडियो भेजा और इसकी हक़ीक़त जाननी चाही है.
पेशे से हीरों के व्यापारी अवि डांडिया ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख़ ख़ान के बारे में टिप्पणियों पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया देकर साल 2015 में भी सुर्खियाँ बटोरी थीं.
लेकिन इस बार लाइव वीडियो में जो ऑडियो उन्होंने लोगों को सुनवाया है, वो भारी एडिटिंग के दम पर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और गृह मंत्री राजनाथ सिंह के बयानों को जोड़-तोड़कर बनाया गया है.
यानी वीडियो में जिस अनजान महिला की आवाज़ सुनाई देती है और लगता है कि वो दोनों नेताओं से सवाल पूछ रही हैं, उसके जवाब में सुनाई दे रही अमित शाह और राजनाथ सिंह की आवाज़ को उनके अलग-अलग साक्षात्कारों से निकाला गया है और उन्हें बेहद भ्रामक संदर्भ दे दिये गए हैं.
मसलन, वायरल ऑडियो के जिस हिस्से में राजनाथ सिंह कहते हैं, "जवानों के सवाल पर हमारी देश बहुत सेंसेटिव है, बहुत संवेदनशील है...", वो हिस्सा राजनाथ सिंह के पुलवामा हमले से एक हफ़्ते बाद (22 फ़रवरी को) इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू का है.
पुलवामा हमले के बाद इस पहले इंटरव्यू में भारत के गृह मंत्री ने कहा था कि मारे गए जवानों को लेकर राजनीति नहीं होनी चाहिए.
उन्होंने ये बयान "कांग्रेस द्वारा पीएम मोदी के पुलवामा हमले की सूचना मिलने पर भी जिम कॉर्बेट पार्क में घूमते रहने के आरोप" के जवाब में दिया था.
वायरल ऑडियो में राजनाथ सिंह के इसी इंटरव्यू को तीन से चार बार ग़लत तरीक़े से एडिट कर इस्तेमाल किया गया है.
वहीं बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के पिछले साल ज़ी न्यूज़ को दिए इंटरव्यू से भी कुछ हिस्से निकाले गए हैं और उनके बयानों को तोड़-मरोड़ कर इस्तेमाल किया गया है.
वायरल ऑडियो में जहाँ अमित शाह कहते हैं, "देश की जनता को गुमराह किया जा सकता है. और हम मानते भी है चुनाव के लिए युद्ध करने की ज़रूरत है.", ये उसी इंटरव्यू के अंश हैं.
लेकिन उनके बयान से कुछ शब्द हटा दिए गए हैं और दो या तीन अलग वाक्यों को जोड़कर एक वाक्य बनाया गया है.
पूरे इंटरव्यू में कहीं भी अमित शाह एक जगह ये नहीं कहते सुने जाते कि "देश की जनता को गुमराह किया जा सकता है और चुनाव के लिए युद्ध की ज़रूरत है".
हालांकि इस फ़र्ज़ी ऑडियो के कुछ हिस्से ऐसे भी हैं जिनके बारे में ये साफ़ तौर पर नहीं कहा जा सकता कि राजनाथ सिंह और अमित शाह की आवाज़ को कहाँ से लिया गया है.
लेकिन ये स्पष्ट है कि ये किसी कॉल की रिकॉर्डिंग नहीं है जिसमें ये दोनों बीजेपी नेता, ऑडियो में सुनाई दे रहीं महिला से बात कर रहे हों.
वायरल वीडियो में अवि डांडिया अपने दावे को मज़बूती देने के लिए एक कथित कॉल रिकॉर्डिंग सुनवाते हैं जिसमें भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह और भारत के गृह मंत्री राजनाथ सिंह को इस बारे में एक अनजान महिला के साथ बात करते हुए सुना जा सकता है.
इस भ्रामक कॉल रिकॉर्डिंग को सुनकर ऐसा लगता है कि पुलवामा हमले की साज़िश बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने ही रची थी. लेकिन अपनी पड़ताल में हमने पाया है कि ये कॉल रिकॉर्डिंग फ़ेक यानी फर्जी है.
1 मार्च को अवि डांडिया ने अपने फ़ेसबुक पेज के ज़रिए लाइव आकर ये ऑडियो लोगों को सुनवाया था.
उन्होंने लिखा था, "सच क्या है, सुनिए अगर विश्वास ना हो और देश की आवाम में दम हो तो पूछे उनसे जिनकी आवाज़ है, जो सेना के नहीं वो आवाम के क्या होंगे."
अवि डांडिया के फ़ेसबुक पेज पर अब ये लाइव वीडियो उपलब्ध नहीं है, लेकिन इंटरनेट आर्काइव से पता चलता है कि वीडियो हटाए जाने से पहले 23 लाख से ज़्यादा बार ये वीडियो देखा गया है और एक लाख से ज़्यादा लोगों ने इसे फ़ेसबुक पर शेयर भी किया है.
'डेली कैपिटल' और 'सियासत डॉट पीके' जैसी छोटी पाकिस्तानी वेबसाइट्स ने भी अवि डांडिया के वीडियो को आधार बनाकर बीजेपी के ख़िलाफ़ ख़बरें लिखी हैं.
सैकड़ों लोग इस वीडियो को फ़ेसबुक से डाउनलोड कर चुके हैं और इसे व्हॉट्सऐप पर शेयर कर रहे हैं. बीबीसी के कई पाठकों ने भी व्हॉट्सऐप के ज़रिए हमें ये वीडियो भेजा और इसकी हक़ीक़त जाननी चाही है.
पेशे से हीरों के व्यापारी अवि डांडिया ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख़ ख़ान के बारे में टिप्पणियों पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया देकर साल 2015 में भी सुर्खियाँ बटोरी थीं.
लेकिन इस बार लाइव वीडियो में जो ऑडियो उन्होंने लोगों को सुनवाया है, वो भारी एडिटिंग के दम पर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और गृह मंत्री राजनाथ सिंह के बयानों को जोड़-तोड़कर बनाया गया है.
यानी वीडियो में जिस अनजान महिला की आवाज़ सुनाई देती है और लगता है कि वो दोनों नेताओं से सवाल पूछ रही हैं, उसके जवाब में सुनाई दे रही अमित शाह और राजनाथ सिंह की आवाज़ को उनके अलग-अलग साक्षात्कारों से निकाला गया है और उन्हें बेहद भ्रामक संदर्भ दे दिये गए हैं.
मसलन, वायरल ऑडियो के जिस हिस्से में राजनाथ सिंह कहते हैं, "जवानों के सवाल पर हमारी देश बहुत सेंसेटिव है, बहुत संवेदनशील है...", वो हिस्सा राजनाथ सिंह के पुलवामा हमले से एक हफ़्ते बाद (22 फ़रवरी को) इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू का है.
पुलवामा हमले के बाद इस पहले इंटरव्यू में भारत के गृह मंत्री ने कहा था कि मारे गए जवानों को लेकर राजनीति नहीं होनी चाहिए.
उन्होंने ये बयान "कांग्रेस द्वारा पीएम मोदी के पुलवामा हमले की सूचना मिलने पर भी जिम कॉर्बेट पार्क में घूमते रहने के आरोप" के जवाब में दिया था.
वायरल ऑडियो में राजनाथ सिंह के इसी इंटरव्यू को तीन से चार बार ग़लत तरीक़े से एडिट कर इस्तेमाल किया गया है.
वहीं बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के पिछले साल ज़ी न्यूज़ को दिए इंटरव्यू से भी कुछ हिस्से निकाले गए हैं और उनके बयानों को तोड़-मरोड़ कर इस्तेमाल किया गया है.
वायरल ऑडियो में जहाँ अमित शाह कहते हैं, "देश की जनता को गुमराह किया जा सकता है. और हम मानते भी है चुनाव के लिए युद्ध करने की ज़रूरत है.", ये उसी इंटरव्यू के अंश हैं.
लेकिन उनके बयान से कुछ शब्द हटा दिए गए हैं और दो या तीन अलग वाक्यों को जोड़कर एक वाक्य बनाया गया है.
पूरे इंटरव्यू में कहीं भी अमित शाह एक जगह ये नहीं कहते सुने जाते कि "देश की जनता को गुमराह किया जा सकता है और चुनाव के लिए युद्ध की ज़रूरत है".
हालांकि इस फ़र्ज़ी ऑडियो के कुछ हिस्से ऐसे भी हैं जिनके बारे में ये साफ़ तौर पर नहीं कहा जा सकता कि राजनाथ सिंह और अमित शाह की आवाज़ को कहाँ से लिया गया है.
लेकिन ये स्पष्ट है कि ये किसी कॉल की रिकॉर्डिंग नहीं है जिसमें ये दोनों बीजेपी नेता, ऑडियो में सुनाई दे रहीं महिला से बात कर रहे हों.
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