Thursday, November 1, 2018

मुस्लिम देशः कहां क्या है ईशनिंदा क़ानून

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने ईसाई महिला आसिया बीबी को ईशनिंदा के एक मामले में बरी कर दिया है.

निचली अदालत और फिर हाई कोर्ट ने इस मामले में आसिया बीबी को मौत की सज़ा सुनाई थी.

उसी सज़ा के ख़िलाफ़ अपील की सुनवाई करते हुए अदालत ने आसिया बीबी को अब बरी कर दिया है.

फ़ैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस मियां साक़िब निसार ने कहा कि वो हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फ़ैसलों को रद्द करते हैं.

आसिया पर उनके पड़ोस में रहनेवाली महिलाओं ने पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने के आरोप लगाए थे.

अदालत के इस फ़ैसले के बाद पाकिस्तान में एक बार फ़िर तौहीन-ए-रिसालत यानी ईशनिंदा क़ानून पर बहस तेज़ हो गई है.

साल 1990 के बाद से अब तक पाकिस्तान में भीड़ या लोगों ने ईशनिंदा का आरोप लगाकर कम से कम 69 लोगों की हत्या कर दी है.

अलग-अलग संस्थानों से जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक पाकिस्तान में इस समय 40 लोग ईशनिंदा के क़ानून के तहत दोषी क़रार दिए जाने के बाद या तो मौत की सज़ा का इंतज़ार कर रहे हैं या उम्रक़ैद काट रहे हैं.

पाकिस्तान में निचली अदालतों में आए सैकड़ों मामलों में ईश-निंदा के लिए लोगों को सज़ा सुनाई गई लेकिन हाई कोर्ट ने सबूतों के अभाव, छानबीन की प्रक्रिया में कमी या शिकायतकर्ता की गलत मंशा को देखते हुए फैसलों को पलट दिया. इसमें से सैकड़ों ईसाई हैं जिनपर आरोप लगाए गए हैं.

कई देशों में ईशनिंदा क़ानून
लेकिन पाकिस्तान दुनिया का ऐसा अकेला देश नहीं है जहां ईशनिंदा को लेकर क़ानून हैं. शोध संस्थान प्यू रिसर्च की ओर से साल 2015 में जारी की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 26 फ़ीसदी देशों में धर्म के अपमान से जुड़े क़ानून हैं जिनके तहत सज़ा के प्रावधान हैं. इनमें से 70 फ़ीसदी देश मुस्लिम बहुल है.

इन देशों में ईशनिंदा के आरोप के तहत जुर्माना और क़ैद की सज़ा के प्रावधान हैं लेकिन सऊदी अरब, ईरान और पाकिस्तान में इस अपराध में मौत तक की सज़ा का प्रावधान है.

एक नज़र ऐसे चुनिंदा देशों पर जहां ईशनिंदा से जुड़े क़ानून हैं.

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पाकिस्तान

धर्म से संबंधित आपराधिक मामलों को सबसे पहले ब्रिटिश शासनकाल के दौरान वर्ष 1860 में संहिताबद्ध किया गया था और इसमें वर्ष 1927 में विस्तार किया गया.

विभाजन के बाद पाकिस्तान ने इसे अपना लिया.

पाकिस्तान में ज़िया-उल हक़ की सैन्य सरकार के दौरान 1980 से 86 के बीच इसमें और धाराएं शामिल की गईं. वे उनका इस्लामीकरण करना चाहते थे और वर्ष 1973 में अहमदी समुदाय को ग़ैर-मुस्लिम समुदाय घोषित किया गया था और वो इसे क़ानूनी तौर पर अलग करना चाहते थे.

ब्रितानी शासनकाल के दौरान बनाया गया ये आम क़ानून था. इसके तहत अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी पूजा करने की वस्तु या जगह को नुकसान या फिर धार्मिक सभा में खलल डालता है तो उसे दंड दिया जाएगा. साथ ही अगर कोई किसी की धार्मिक भावनाओं का अपमान बोलकर या लिखकर या कुछ दृष्यों से करता है तो वो भी गैरक़ानूनी माना गया.

इस क़ानून के तहत एक से 10 साल तक की सज़ा दी सकती थी जिसमें जुर्माना भी लगाया जा सकता था. वर्ष 1980 की शुरुआत में पाकिस्तान की दंड संहिता में धार्मिक मामलों से संबंधित अपराधों में कई धाराएं जोड़ दी गईं.

इन धाराओं को दो भागों में बांटा गया- जिसमें पहला अहमदी विरोधी क़ानून और दूसरा ईशनिंदा क़ानून शामिल किया गया.

अहमदी विरोधी क़ानून 1984 में शामिल गया था. इस क़ानून के तहत अहमदियों को खुद को मुस्लिम या उन जैसा बर्ताव करने और उनके धर्म का पालन करने पर प्रतिबंध था.

ईशनिंदा क़ानून को कई चरणों में बनाया गया और उसका विस्तार किया गया. वर्ष 1980 में एक धारा में कहा गया कि अगर कोई इस्लामी व्यक्ति के खिलाफ़ अपमानजनक टिप्पणी करता है तो उसे तीन साल तक की जेल हो सकती है.

वहीं वर्ष 1982 में एक और धारा में कहा गया कि अगर कोई व्यक्ति कुरान को अपवित्र करता है तो उसे उम्रकैद की सज़ा दी जाएगी. वर्ष 1986 में अलग धारा जोड़ी गई जिसमें ये कहा गया कि पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ ईशनिंदा के लिए दंडित करने का प्रावधान किया गया और मौत या उम्र कैद की सज़ा की सिफारिश की गई.

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