Wednesday, January 23, 2019

पेप्सी, कोक हो या जिलेट, ये विज्ञापनों की नई हवा है

रेज़र ब्रांड जिलेट ने अपना नया विज्ञापन सिर्फ़ अमरीका में जारी किया. लेकिन 90 सेकेंड के वीडियो की दुनिया भर में चर्चा हुई.

हो सकता है कि आपने भी उसे देखा हो. संभव है कि आपने किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उसे शेयर भी किया हो. जिलेट का विज्ञापन #MeToo आंदोलन से प्रेरित था.

'मर्दानगी से जुड़ी पारंपरिक अवधारणा' को चुनौती देने वाले इस विज्ञापन को नाम दिया गया था 'वी बीलीव.'

इस विज्ञापन ने न सिर्फ़ जिलेट के नये स्लोगन 'दि बेस्ट अ मैन कैन गेट' को दूर-दूर तक पहुंचाया, बल्कि इसने जिलेट के कुछ उपभोक्ताओं को भी निशाने पर लिया.

जिलेट के प्रवक्ता ने 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' से कहा, "ये सकारात्मक बदलाव के लिए हमारी प्रतिबद्धता है. एक ब्रांड, कंपनी और विज्ञापनदाता के रूप में हम योगदान दे रहे हैं."

सामाजिक ज़िम्मेदारी उठाने के लिए 'वी बीलीव' की तारीफ़ भी हुई और इल्ज़ाम लगाने वाले संदेश के लिए इसकी आलोचना भी हुई.

पहले के विज्ञापन अभियानों के उलट अमरीका के बड़े विज्ञापनदाता अब ब्रांडिंग रणनीति के तौर पर विवादित मुद्दों को चुन रहे हैं.

जिलेट से पहले सितंबर 2018 में नाइके ने 'ब्लैक लाइव्स मैटर' आंदोलन को याद करते हुए सैन फ्रांसिस्को फोर्टी नाइनर्स के पूर्व क्वार्टरबैक कॉलिन कैपरनिक के साथ एड कैंपेन किया था.

पेप्सी ने भी 2017 में ब्लैक लाइव्स मैटर की याद दिलाते हुए एक विज्ञापन किया था. उस विज्ञापन में मॉडल केंडल जेनर को लिया गया था.

आंदोलन को हल्का करके दिखाने को लेकर पेप्सी की भारी आलोचना हुई थी, जिसके बाद कंपनी ने अपने विज्ञापन अभियान को 24 घंटे में ही वापस ले लिया था.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ नॉर्थ कैरोलिना-चैपर हिल में मार्केटिंग की क्लिनिकल एसोसिएट प्रोफ़ेसर क्लॉडिया कुबोविच मल्होत्रा का कहना है कि कंपनियां ब्रांडिंग के नाम पर विभाजनकारी सामाजिक मुद्दों को उठा रही हैं और ये सिलसिला रुकने वाला नहीं है.

"इस तरह के विज्ञापनों की शुरुआत भर हुई है. शायद एक समय वह भी आएगा जब ऐसे विज्ञापन बहुतायत में दिखेंगे, लेकिन निकट भविष्य में ऐसा होने वाला नहीं है."

मल्होत्रा कहती हैं, "लोग अब उतने विज्ञापन नहीं देखते जितना पहले देखा करते थे. इसलिए आपको कुछ ऐसा कहने या करने की ज़रूरत होती है जो लोगों का ध्यान खींचे."

विज्ञापनों को बढ़ाने में सोशल मीडिया का भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण हो गई है.

मल्होत्रा का कहना है कि जिलेट ने #MeToo हैशटैग का इस्तेमाल करके संकेत दिया कि वह इस मुद्दे पर ऑनलाइन बहस जारी रखना चाहती है.

सैद बिज़नेस स्कूल के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी सेंटर फ़ॉर कॉरपोरेट रीप्यूटेशन के डायरेक्टर रूपर्ट यंगर को लगता है कि आने वाले दिनों में इस तरह के विज्ञापन आम हो जाएंगे.

"नई नौकरियों में आ रहे युवा नियोक्ता चुनते समय सामाजिक उद्देश्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता देखते हैं."

यंगर का कहना है कि पेटागोनिया जैसी कंपनियां जो अपने सामाजिक उद्देश्यों को लेकर स्पष्ट हैं, बहुत कुछ हासिल कर सकती हैं.

प्रचार कंपनी इडेलमैन के 2018 के एक अध्ययन से पता चला कि दुनिया भर में दो-तिहाई उपभोक्ता अपने सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखकर ख़रीदारी करते हैं.

पिछले साल के मुक़ाबले यह आंकड़ा औसत रूप से 13 फीसदी बढ़ा. ब्रिटेन में इसमें 20 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई.

यंगर कहते हैं कि जैसे-जैसे सामाजिक मुद्दों वाले संदेश आम हो रहे हैं, ब्रांड उपभोक्ताओं तक पहुंचने के लिए अलग-अलग तरकीबें अपनाएंगे.

"कुछ ब्रांड सोशल मीडिया पर भरोसा करेंगे तो कुछ की रणनीति दूसरी तरह से पहुंच बढ़ाने की होगी. कुछ ब्रांड आंतरिक संचार और समूह-स्तर के बयानों और प्रतिबद्धताओं पर ध्यान देंगे."

"सवाल है कि यदि सामाजिक संदेशों वाले विज्ञापन आम हो जाएंगे तो क्या वे प्रभावी रहेंगे? ये तो संभव नहीं है कि हम हर संदेश पर उछल पड़ें. ये बेहद उबाऊ और थकाऊ होगा."

"ये संवेदनाओं को कम कर देगा. ठीक उसी तरह जैसे अब लोग बैनर पर ध्यान नहीं देते. इसीलिए वेबसाइटों पर बैनर वाले विज्ञापन ग़ायब हो रहे हैं."

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